RBSE कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान मास्टर कोर्स
यूरोप और भारत: राष्ट्रवाद
फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्र का विचार
राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से हुई। इस क्रांति से पहले, फ्रांस एक ऐसा भूभाग था जिस पर एक निरंकुश राजा का शासन था। क्रांति ने संप्रभुता राजशाही से निकालकर फ्रांसीसी नागरिकों के समूह को सौंप दी। अब यह घोषणा की गई कि लोगों द्वारा ही राष्ट्र का गठन होगा और वे ही इसकी नियति तय करेंगे।
क्रांतिकारियों ने ऐसे कई कदम उठाए जिनसे फ्रांसीसी लोगों में एक सामूहिक पहचान की भावना पैदा हो सकती थी। पितृभूमि (la patrie) और नागरिक (le citoyen) जैसे विचारों ने एक संयुक्त समुदाय के विचार पर बल दिया, जहाँ सभी को एक संविधान के तहत समान अधिकार प्राप्त थे। पुराने शाही झंडे को हटाकर नया फ्रांसीसी तिरंगा चुना गया।
जब नेपोलियन ने फ्रांस पर नियंत्रण स्थापित किया, तो उसने प्रजातंत्र को नष्ट कर दिया, लेकिन प्रशासनिक क्षेत्र में उसने क्रांतिकारी सिद्धांतों को शामिल किया। 1804 की नागरिक संहिता, जिसे आमतौर पर नेपोलियन की संहिता के नाम से जाना जाता है, ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए। उसने कानून के समक्ष समानता और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया। यह संहिता फ्रांसीसी नियंत्रण वाले क्षेत्रों में भी लागू की गई, जिसने यूरोप में आधुनिक राष्ट्रवाद के विचारों को फैलाने में मदद की।
जर्मनी और इटली का एकीकरण
19वीं सदी के मध्य में, आज के जर्मनी और इटली कई राज्यों, डची और कैंटनों में बंटे हुए थे, जिनके शासकों के अपने स्वतंत्र क्षेत्र थे। राष्ट्रवादी भावनाएँ बढ़ने के साथ, इन बिखरे हुए क्षेत्रों को एक राष्ट्र-राज्य में एकीकृत करने की मांग जोर पकड़ने लगी।
जर्मनी: जर्मनी के एकीकरण का नेतृत्व प्रशिया (Prussia) ने किया। प्रशिया के मुख्यमंत्री, ओटो वॉन बिस्मार्क, इस प्रक्रिया के मुख्य वास्तुकार थे। उन्होंने सैन्य शक्ति का उपयोग करके इस लक्ष्य को प्राप्त किया। ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के साथ तीन युद्धों में प्रशिया की जीत के साथ एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई। जनवरी 1871 में, वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशिया के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया।
इटली: जर्मनी की तरह, इटली भी सात राज्यों में बंटा हुआ था। एकीकरण का श्रेय मुख्य रूप से तीन लोगों को दिया जाता है: ग्यूसेप मैज़िनी, काउंट कैमिलो दे कावूर और ग्यूसेप गैरिबाल्डी। कावूर, जो सार्डिनिया-पीडमोंट का मुख्यमंत्री था, ने फ्रांस के साथ एक चतुर कूटनीतिक गठबंधन के माध्यम से ऑस्ट्रियाई सेना को हराया। गैरिबाल्डी ने सशस्त्र स्वयंसेवकों की मदद से दक्षिणी इटली पर विजय प्राप्त की। 1861 में, विक्टर इमैनुएल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया।
इन दोनों एकीकरणों ने यूरोप में शक्ति संतुलन को बदल दिया और राष्ट्र-राज्यों के उदय को प्रेरित किया।
भारत में राष्ट्रवाद का उदय
यूरोप की तरह ही, भारत में भी आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से जुड़ा हुआ था। ब्रिटिश शासन के तहत, विभिन्न समूहों के लोगों ने उत्पीड़न और दमन का अनुभव किया, जिसने उन्हें एक साथ आने के लिए प्रेरित किया।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) ने भारत में एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा की। रक्षा व्यय में भारी वृद्धि हुई, जिसे करों में वृद्धि और सीमा शुल्क बढ़ाकर पूरा किया गया। कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई, जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं। इसी समय, महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने वहाँ नस्लभेदी शासन के खिलाफ सत्याग्रह नामक एक नए तरह के जन आंदोलन का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था।
सत्याग्रह
noun
सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज। इसका मूल विचार यह था कि यदि आपका उद्देश्य सच्चा है और आपका संघर्ष अन्याय के खिलाफ है, तो उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए आपको शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।
भारत आने के बाद, गांधीजी ने कई स्थानीय सत्याग्रह आंदोलनों का आयोजन किया, जैसे 1917 में बिहार के चंपारण में किसानों के लिए और 1918 में गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों के लिए। इन सफलताओं ने उन्हें एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
प्रमुख जन आंदोलन
1919 में, ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित किया, जिसने सरकार को राजनीतिक कैदियों को बिना किसी मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखने का अधिकार दिया। इस अन्यायपूर्ण कानून के विरोध में, गांधीजी ने एक राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह का आह्वान किया। 13 अप्रैल, 1919 को, अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा पर जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए। इस क्रूर घटना ने पूरे भारत में आक्रोश फैला दिया।
असहयोग और खिलाफत आंदोलन
जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद, गांधीजी को लगा कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक और बड़ा आंदोलन शुरू करने की जरूरत है। उन्होंने महसूस किया कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था, और यदि भारतीय सहयोग करने से इनकार कर दें, तो ब्रिटिश शासन एक साल के भीतर ढह जाएगा।
इसी समय, प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद ओटोमन सम्राट (खलीफा) पर एक कठोर संधि थोपे जाने की अफवाहें थीं। दुनिया भर के मुसलमानों के आध्यात्मिक नेता खलीफा की शक्तियों की रक्षा के लिए भारत में शौकत अली और मुहम्मद अली जैसे मुस्लिम नेताओं ने खिलाफत समिति का गठन किया। गांधीजी ने इसे हिंदू और मुसलमानों को एकजुट करने के एक अवसर के रूप में देखा और कांग्रेस को खिलाफत के समर्थन में एक असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए राजी किया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन
1920 के दशक के अंत तक, भारतीय राजनीति में फिर से हलचल हुई। ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक सुधारों का अध्ययन करने के लिए सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक आयोग, साइमन कमीशन का गठन किया। समस्या यह थी कि इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। जब 1928 में साइमन कमीशन भारत पहुँचा, तो इसका स्वागत 'साइमन गो बैक' के नारों से किया गया।
इस पृष्ठभूमि में, गांधीजी ने एक बार फिर एक बड़े आंदोलन की योजना बनाई। उन्होंने वायसराय इरविन को 11 सूत्री मांगें भेजीं, जिनमें नमक कर को समाप्त करने की मांग भी शामिल थी। जब उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो उन्होंने अपना प्रसिद्ध दांडी मार्च शुरू किया। 12 मार्च, 1930 को, उन्होंने अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी के तटीय शहर तक 240 मील की पैदल यात्रा की। वहाँ पहुँचकर, उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाया और नमक कानून तोड़ा।
यह सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत थी। यह असहयोग आंदोलन से इस मायने में अलग था कि इस बार लोगों से न केवल अंग्रेजों का सहयोग न करने, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने का भी आह्वान किया गया था।
| घटना | वर्ष | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| रॉलेट एक्ट सत्याग्रह | 1919 | राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमे के हिरासत में रखने के खिलाफ। |
| जलियाँवाला बाग हत्याकांड | 1919 | अमृतसर में शांतिपूर्ण भीड़ पर गोलीबारी। |
| असहयोग आंदोलन | 1920-22 | सरकारी संस्थानों, वस्तुओं और चुनावों का बहिष्कार। |
| साइमन कमीशन | 1928 | संवैधानिक सुधारों के लिए, कोई भारतीय सदस्य नहीं। |
| दांडी मार्च | 1930 | नमक कानून तोड़ने के लिए 240 मील की पैदल यात्रा। |
| पूना पैक्ट | 1932 | गांधीजी और डॉ. अंबेडकर के बीच दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल पर समझौता। |
सामूहिक अपनेपन का भाव
राष्ट्रवाद तभी पनपता है जब लोग यह महसूस करने लगते हैं कि वे एक ही राष्ट्र के अंग हैं। यह भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के माध्यम से आती है, लेकिन यह इतिहास, साहित्य, लोक कथाओं और प्रतीकों के माध्यम से भी बनती है।
भारत में, राष्ट्र की पहचान को भारत माता की छवि के रूप में दर्शाया गया। यह छवि पहली बार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा बनाई गई थी। 1870 के दशक में, उन्होंने 'वंदे मातरम' को राष्ट्र के भजन के रूप में लिखा। बाद में, अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता को एक तपस्विनी के रूप में चित्रित किया; वह शांत, गंभीर, दिव्य और आध्यात्मिक थीं।
लोक कथाओं और लोक गीतों ने भी राष्ट्रवाद को आकार देने में मदद की। राष्ट्रवादियों ने गांवों का दौरा किया ताकि इन लोक परंपराओं को इकट्ठा किया जा सके और एक ऐसी राष्ट्रीय पहचान बनाई जा सके जो अतीत की महानता को दर्शाती हो। जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलन विकसित हुआ, राष्ट्रवादी नेताओं ने लोगों को एकजुट करने और उनमें राष्ट्रवाद की भावना भरने के लिए इन प्रतीकों और चिह्नों का अधिक से अधिक उपयोग किया।
1789 की फ्रांसीसी क्रांति का राष्ट्रवाद के लिए सबसे महत्वपूर्ण परिणाम क्या था?
1804 की नेपोलियन संहिता के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सत्य है?
यूरोप और भारत दोनों में राष्ट्रवाद की यात्रा जटिल और बहुआयामी थी। इसने न केवल सीमाओं को फिर से परिभाषित किया, बल्कि लोगों की पहचान और अपनेपन की भावना को भी नया आकार दिया।
