बिहार बोर्ड 10वीं नॉन हिंदी परीक्षा मार्गदर्शिका
कि़सलय भाग 3 गद्य खण्ड
ईदगाह: एक बच्चे के मन की दुनिया
ईदगाह कहानी सिर्फ़ ईद के त्योहार का वर्णन नहीं है, यह एक छोटे बच्चे, हामिद के मनोविज्ञान की गहरी पड़ताल है। लेखक प्रेमचंद हमें दिखाते हैं कि गरीबी और ज़िम्मेदारियाँ कैसे एक बच्चे को समय से पहले बड़ा बना देती हैं। हामिद के दोस्त जहाँ मेले में खिलौने और मिठाइयाँ खरीदते हैं, वहीं हामिद अपनी बूढ़ी दादी के लिए तीन पैसे का चिमटा खरीदता है। उसे याद आता है कि रोटी सेकते समय उसकी दादी की उँगलियाँ जल जाती हैं।
यह कहानी बाल मनोविज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ हामिद का चिमटा खरीदना उसके त्याग, प्रेम और परिपक्वता का प्रतीक बन जाता है।
हामिद अपने दोस्तों के सामने अपने चिमटे को खिलौनों से बेहतर साबित करने के लिए जो तर्क देता है, वे किसी बच्चे के नहीं, बल्कि एक समझदार व्यक्ति के लगते हैं। वह कहता है कि उसका चिमटा बहादुर है, आग-पानी में डटा रहता है और खिलौने तो मिट्टी के हैं, गिरते ही टूट जाएँगे। इस तरह, प्रेमचंद ने हामिद के चरित्र के माध्यम से अभाव में जीने वाले बच्चों की सोच और उनकी भावनाओं को बड़ी ही संवेदनशीलता से दर्शाया है।
बालगोबिन भगत: समाज को चुनौती देता एक गृहस्थ
बालगोबिन भगत एक अनोखे इंसान हैं। वे गृहस्थ हैं, खेती-बाड़ी करते हैं, लेकिन उनका आचरण साधुओं जैसा है। रामवृक्ष बेनीपुरी ने उनके चरित्र का ऐसा रेखाचित्र खींचा है कि वह हमारी आँखों के सामने जीवंत हो उठते हैं। वे कबीर के पक्के अनुयायी थे और उनके ही गीत गाते थे। वे किसी की चीज़ नहीं छूते थे और न ही बिना पूछे व्यवहार में लाते थे।
उनका व्यक्तित्व सामाजिक कुरीतियों पर एक मौन लेकिन शक्तिशाली प्रहार था। वे परंपराओं को विवेक की कसौटी पर कसते थे।
उनकी सामाजिक चेतना सबसे ज़्यादा तब दिखाई देती है जब उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हो जाती है। वे रोने-धोने की बजाय अपनी पतोहू से भी कहते हैं कि यह शोक का नहीं, उत्सव का समय है, क्योंकि आत्मा परमात्मा से जा मिली है। इतना ही नहीं, श्राद्ध की अवधि पूरी होने पर वे अपनी पतोहू के भाई को बुलाकर उसका पुनर्विवाह करने का आदेश देते हैं। उस ज़माने में विधवा-विवाह की बात सोचना भी एक बहुत बड़ी क्रांतिकारी पहल थी।
कुरीति
noun
समाज में प्रचलित कोई ऐसी परंपरा या रिवाज जो अनुचित, हानिकारक या अविवेकपूर्ण हो।
हुंडरू का जलप्रपात और ठेस की आंचलिकता
अब हम दो ऐसी कहानियों पर नज़र डालेंगे जो बिहार की धरती और संस्कृति से गहराई से जुड़ी हैं। 'हुंडरू का जलप्रपात' एक यात्रा वृत्तांत है जो हमें छोटानागपुर के पठार की प्राकृतिक सुंदरता से परिचित कराता है। लेखक ने झरने की शक्ति, उसकी गर्जना और आसपास के मनमोहक दृश्य का ऐसा वर्णन किया है कि लगता है हम खुद वहीं मौजूद हैं। यह पाठ हमें प्रकृति की भव्यता के साथ-साथ वहाँ के आदिवासी जीवन की सादगी और संघर्षों की भी एक झलक देता है।
दूसरी ओर, 'ठेस' कहानी ग्रामीण कलाकार के सम्मान और उसके संवेदनशील मन की कहानी है। इसके मुख्य पात्र सिरचन एक कुशल कारीगर हैं, जो शीतलपाटी और चिक बनाने में माहिर हैं। लेकिन वे बहुत स्वाभिमानी भी हैं। जब उन्हें लगता है कि घर के लोग उनका सम्मान नहीं कर रहे और सिर्फ़ एक मजदूर समझ रहे हैं, तो उनके आत्मसम्मान को 'ठेस' पहुँचती है और वे काम अधूरा छोड़कर चले जाते हैं।
सिरचन का चरित्र यह संदेश देता है कि कलाकार को सिर्फ़ उसकी कला की मज़दूरी नहीं, बल्कि सम्मान भी चाहिए।
कहानी के अंत में, जब सिरचन बिना पैसे लिए मानू के लिए सारे उपहार स्टेशन पर पहुँचाता है, तो उसका महान और संवेदनशील हृदय उजागर होता है। यह कहानी का एक прекрасный उदाहरण है, जिसमें ग्रामीण परिवेश, वहाँ की भाषा और संस्कृति का गहरा रंग देखने को मिलता है।
| पाठ | मुख्य पात्र | केंद्रीय भाव |
|---|---|---|
| ईदगाह | हामिद | बाल मनोविज्ञान, त्याग और प्रेम |
| बालगोबिन भगत | बालगोबिन भगत | सादा जीवन, सामाजिक सुधार |
| हुंडरू का जलप्रपात | (प्रकृति) | प्रकृति का सौंदर्य और शक्ति |
| ठेस | सिरचन | कलाकार का सम्मान और स्वाभिमान |
आइए अब कुछ प्रश्नों के माध्यम से अपनी समझ को परखते हैं।
ईदगाह कहानी में हामिद ने मेले में अपने तीन पैसों से क्या खरीदा?
बालगोबिन भगत के चरित्र की सबसे बड़ी क्रांतिकारी विशेषता क्या थी?
इन चारों पाठों के माध्यम से हम मानव स्वभाव, सामाजिक परंपराओं और प्रकृति के विभिन्न रूपों को समझते हैं। ये कहानियाँ हमें संवेदनशील बनाती हैं और अपने आसपास की दुनिया को एक नई नज़र से देखना सिखाती हैं।
