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बह्र और अर्कान

बह्र और अर्कान

शायरी की दुनिया में लय और ताल सिर्फ़ एहसास की बात नहीं है, यह एक विज्ञान है। इस विज्ञान का आधार 'बह्र' (मीटर) है। बह्र, 'अर्कान' (पैरों या लयबद्ध घटकों) के एक निश्चित संयोजन से बनती है। पिछले पाठों में आपने बुनियादी बातें सीखी हैं, अब हम यह समझेंगे कि ये अर्कान कैसे जुड़कर एक मिसरे (कविता की एक पंक्ति) को संगीतमय बनाते हैं।

अर्कान के प्रकार: सलीम और मुज़ाहिफ़

अर्कान, जो बह्र की बुनियादी इकाइयाँ हैं, दो मुख्य प्रकार के होते हैं: सलीम और मुज़ाहिफ़।

सलीम अर्कान: ये अपनी मूल, पूरी और शुद्ध अवस्था में होते हैं। शायरी के विज्ञान में ऐसे कुल आठ मूल अर्कान हैं। इन्हें बह्र के निर्माण का आधार माना जाता है।

मुज़ाहिफ़ अर्कान: ये सलीम अर्कान से निकले हुए रूप हैं। इन्हें एक प्रक्रिया के माध्यम से बनाया जाता है जिसे '' कहते हैं, जिसमें मूल रुक्न (घटक) के अक्षरों में थोड़ा बदलाव करके एक नई, मिलती-जुलती ध्वनि पैदा की जाती है। यह शायरी में विविधता और लचीलापन लाता है।

सलीम रुक्न (मूल)उससे बना मुज़ाहिफ़ रुक्न (परिवर्तित)
फ़ाइलातुन (فاعلاتن)फ़इलातुन (فعلاتن)
मफ़ाईलुन (مفاعیلن)मफ़ाईलु (مفاعیلُ)
मुस्तफ़इलुन (مستفعلن)मुफ़्तइलुन (مفتعلن)

ज़िहाफ़ का उपयोग करने से एक ही मूल बह्र में कई अलग-अलग वज़्न (वजन) बनाना संभव हो जाता है, जिससे शायर को अपने शब्दों को सही ढंग से फिट करने के लिए अधिक विकल्प मिलते हैं।

दो मशहूर बह्रें

यूँ तो शायरी में कई बह्रें हैं, लेकिन दो सबसे लोकप्रिय और अक्सर इस्तेमाल होने वाली बह्रें हैं: और बह्र-ए-रमल।

बह्र-ए-हज़ज

noun

यह बह्र 'मफ़ाईलुन' (مفاعیلن) रुक्न की पुनरावृत्ति पर आधारित है। इसका वज़्न 1222 है।

मफ़ाईलुन / मफ़ाईलुन / मफ़ाईलुन / मफ़ाईलुन1222 / 1222 / 1222 / 1222\text{मफ़ाईलुन / मफ़ाईलुन / मफ़ाईलुन / मफ़ाईलुन} \\ \text{1222 / 1222 / 1222 / 1222}

बह्र-ए-रमल

noun

यह बह्र 'फ़ाइलातुन' (فاعلاتن) रुक्न की पुनरावृत्ति पर आधारित है। इसका वज़्न 2122 है।

फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन2122 / 2122 / 2122 / 2122\text{फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन} \\ \text{2122 / 2122 / 2122 / 2122}

तक्ती करने का उन्नत तरीक़ा

'तक्ती' वह प्रक्रिया है जिससे हम किसी मिसरे को उसके अर्कान में तोड़कर यह जाँचते हैं कि वह बह्र में है या नहीं। इसके लिए हम हर अक्षर को उसके ध्वनि-भार या वज़्न के अनुसार 1 (लघु) या 2 (गुरु) में बाँटते हैं।

हिज्जे की गिनती के नियम:

  • (लघु - 1): एक अकेला अक्षर जिस पर ज़बर, ज़ेर या पेश हो, जैसे 'अ', 'कि', 'तु'।
  • हिज्जे-बुलंद (गुरु - 2): दो अक्षरों का जोड़, जैसे 'आप', 'हम', 'दिल', 'जा'। इसमें पहला अक्षर हरकत वाला (vowel-less) और दूसरा ساکن (consonant) होता है।

आइए एक उदाहरण देखें। ग़ालिब का एक मिसरा है: "दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है"।

यह मिसरा बह्र-ए-रमल के एक परिवर्तित रूप में है, जिसका वज़्न है: फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलातुन / फ़ाइलुन 2122 / 2122 / 2122 / 212

ध्यान दें कि तक्ती में हम लिखते कैसे हैं, यह मायने नहीं रखता। हम बोलते कैसे हैं, यह मायने रखता है। जो अक्षर बोलने में नहीं आते, उन्हें गिना नहीं जाता।

अब हम मिसरे को उसके ध्वनि-भार के अनुसार तोड़ते हैं:

शब्दध्वनि-विभाजनवज़्न
दिल-ए-नादाँदि ले ना दाँ2 1 2 2
तुझे हुआतु झे हु आ1 2 1 2
क्या हैक् या है2 2

अगर आप इस मिसरे के वज़्न को देखें तो यह बनता है: 2122 / 1212 / 22। यह पहली नज़र में बह्र से बाहर लगता है। यहीं पर ज़िहाफ़ का जादू काम आता है।

बह्र-ए-रमल में 'फ़ाइलातुन' (2122) को 'फ़इलातुन' (1122) में बदला जा सकता है। हमारे मिसरे में दूसरे रुक्न 'तु झे हु आ' (1212) को शायर अपनी सुविधा के लिए 'फ़इलातुन' के एक और परिवर्तित रूप 'मफ़ऊलुन' (1212) के बराबर मान लेते हैं। इसी तरह अंतिम 'क्या है' (22) को 'फ़ाइलुन' (212) के छोटे रूप 'फ़अल्' (22) से बदल दिया जाता है।

यह जटिल लग सकता है, लेकिन अभ्यास से आप इन पैटर्न्स को पहचानने लगते हैं। मुख्य बात यह समझना है कि बह्र एक कठोर ढाँचा नहीं, बल्कि एक लचीला système है जो शायर को रचनात्मक स्वतंत्रता देता है।

Quiz Questions 1/6

शायरी में 'बह्र' का मुख्य उद्देश्य क्या है?

Quiz Questions 2/6

'सलीम अर्कान' से निकले हुए परिवर्तित रूपों को क्या कहा जाता है?

बह्र और अर्कान का ज्ञान शायरी को गहराई से समझने और लिखने के लिए ज़रूरी है। यह आपको शब्दों को सही लय में पिरोने की कला सिखाता है, जिससे आपकी शायरी में संगीत और प्रवाह दोनों आते हैं।