जर्मन एकीकरण और बिस्मार्क की कूटनीति
वियना कांग्रेस और जर्मन परिसंघ
वियना कांग्रेस और एक नई यूरोपीय व्यवस्था
नेपोलियन बोनापार्ट की हार के बाद, यूरोप के नक्शे को फिर से बनाने की जरूरत थी। 1815 में, महाशक्तियों के नेता ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में एकत्र हुए। उनका लक्ष्य सिर्फ सीमाओं को फिर से बनाना नहीं था, बल्कि भविष्य में फ्रांस जैसी किसी भी एक शक्ति को बहुत मजबूत होने से रोकना भी था। वे यूरोप में 'शक्ति संतुलन' बनाना चाहते थे।
इस सम्मेलन का मुख्य सूत्रधार ऑस्ट्रियाई चांसलर क्लेमेंस वॉन मेटरनिक था। उसकी सोच रूढ़िवादी थी और वह फ्रांसीसी क्रांति के उदारवादी और राष्ट्रवादी विचारों का कट्टर विरोधी था। मेटरनिक का मानना था कि यूरोप में शांति बनाए रखने के लिए राजशाही को मजबूत करना और किसी भी तरह की क्रांति को कुचलना जरूरी है। इस पूरी व्यवस्था को 'मेटरनिक व्यवस्था' के नाम से जाना गया, जिसने अगले कुछ दशकों तक यूरोपीय राजनीति को प्रभावित किया।
वियना कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य यथास्थिति बनाए रखना था: यानी मौजूदा शासकों को सत्ता में रखना और राष्ट्रवाद और उदारवाद के नए विचारों को दबाना।
जर्मन परिसंघ का जन्म
नेपोलियन के उदय से पहले, जर्मनी 300 से अधिक छोटे-छोटे राज्यों का एक बिखरा हुआ समूह था, जिसे पवित्र रोमन साम्राज्य कहा जाता था। नेपोलियन ने इसे भंग कर दिया था। वियना में, नेताओं ने एक एकीकृत जर्मन राष्ट्र बनाने के बजाय, 39 जर्मन-भाषी राज्यों का एक ढीला-ढाला संगठन बनाया। इसे जर्मन परिसंघ या Deutscher Bund कहा गया।
जर्मन परिसंघ
यह परिसंघ एक राष्ट्र नहीं था। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य राज्यों की स्वतंत्रता को बनाए रखना और बाहरी हमलों के खिलाफ एक सामूहिक सुरक्षा प्रदान करना था। इसकी एक केंद्रीय संसद थी, जिसे फ्रैंकफर्ट में स्थित डाइट (Diet) कहा जाता था, लेकिन इसके पास बहुत कम वास्तविक शक्ति थी। महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए सभी सदस्य राज्यों की सहमति आवश्यक थी, जो लगभग असंभव था। वास्तव में, यह ऑस्ट्रिया के प्रभुत्व वाला एक उपकरण था, जिसका उपयोग जर्मन राज्यों में राष्ट्रवादी भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए किया जाता था।
इस व्यवस्था के भीतर ऑस्ट्रिया और प्रशिया के बीच एक अंतर्निहित प्रतिद्वंद्विता थी। दोनों ही जर्मन राज्यों पर अपना प्रभाव चाहते थे। इस द्वैतवाद (Dualism) ने परिसंघ को और भी कमजोर बना दिया और अंततः जर्मन एकीकरण के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण कारक बन गया।
राष्ट्रवाद का दमन
नेपोलियन के खिलाफ युद्धों ने जर्मन लोगों में एक साझा पहचान और राष्ट्रवादी भावना को जन्म दिया था। कई युवा, विशेषकर विश्वविद्यालयों के छात्र, एक संयुक्त और उदार जर्मनी का सपना देखते थे। उन्होंने (छात्र संगठन) नामक समूह बनाए, जो जर्मन एकता के प्रबल समर्थक थे।
छात्र बिरादरी
मेटरनिक ने इन राष्ट्रवादी आंदोलनों को अपनी व्यवस्था के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखा। 1819 में, जब एक कट्टरपंथी छात्र ने एक रूढ़िवादी लेखक की हत्या कर दी, तो मेटरनिक को कार्रवाई करने का बहाना मिल गया। उसने कार्ल्सबैड में जर्मन राज्यों के प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलाई।
इस बैठक के परिणामस्वरूप 'कार्ल्सबैड डिक्री' जारी की गई। ये ऐसे कानून थे जिन्होंने उदारवाद और राष्ट्रवाद को बेरहमी से कुचल दिया।
| उपाय | उद्देश्य |
|---|---|
| विश्वविद्यालयों की निगरानी | उदारवादी प्रोफेसरों को बर्खास्त करना और छात्र संगठनों पर प्रतिबंध लगाना। |
| प्रेस सेंसरशिप | राष्ट्रवादी या क्रांतिकारी विचारों वाले किसी भी प्रकाशन पर रोक लगाना। |
| केंद्रीय जांच आयोग | 'क्रांतिकारी' गतिविधियों की जांच करने और संदिग्धों पर मुकदमा चलाने के लिए। |
कार्ल्सबैड डिक्री ने कुछ समय के लिए राष्ट्रवादी आंदोलन को भूमिगत कर दिया, लेकिन यह भावनाओं को पूरी तरह से खत्म नहीं कर सका। ऑस्ट्रियाई दमन के बावजूद, एक एकीकृत जर्मनी का विचार जीवित रहा। इसने उस मंच की स्थापना की जिस पर बाद में ओटो वॉन बिस्मार्क जर्मन एकीकरण का नाटक खेलेंगे, लेकिन वह एक अलग कहानी है।
आइए देखें कि आपने इस अनुभाग से कितना सीखा है।
1815 में वियना में एकत्रित यूरोपीय शक्तियों का मुख्य लक्ष्य क्या था?
वियना कांग्रेस के बाद स्थापित 'मेटरनिक व्यवस्था' का मुख्य वास्तुकार कौन था?
अगले लेख में, हम देखेंगे कि कैसे आर्थिक ताकतें, विशेष रूप से ज़ोलवेरिन (Zollverein), ने राजनीतिक एकता का मार्ग प्रशस्त किया।
