प्रबंध गान उत्पत्ति और विकास
प्रबंध संगीत की उत्पत्ति
प्रबंध संगीत की उत्पत्ति
आप ध्रुपद की गंभीर और ध्यानपूर्ण शैली से पहले से ही परिचित हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ध्रुपद का विकास कहाँ से हुआ? इसका जवाब 'प्रबंध' में छिपा है, जो ध्रुपद का प्रत्यक्ष पूर्वज है। प्रबंध को समझने के लिए, हमें भारतीय संगीत के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर वापस जाना होगा, जब संगीत 'मार्गी' से 'देशी' की ओर बढ़ रहा था।
मार्गी से देशी का सफ़र
प्राचीन काल में, संगीत का एक रूप था जिसे 'गंधर्व' या 'मार्गी' संगीत कहा जाता था। यह संगीत बहुत ही कठोर नियमों से बंधा हुआ था और इसका मुख्य उद्देश्य धार्मिक अनुष्ठान और मोक्ष की प्राप्ति था। यह आम लोगों के मनोरंजन के लिए नहीं था।
समय के साथ, जैसे-जैसे संगीत भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैला, संगीतकारों ने स्थानीय धुनों, भाषाओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को इसमें शामिल करना शुरू कर दिया। संगीत के इस नए, लचीले और क्षेत्रीय रूप को 'देशी संगीत' कहा गया। यह वह संगीत था जो लोगों से जुड़ता था। इसी की परंपरा में प्रबंध गायन का उदय हुआ, जो उस समय की सबसे प्रमुख शास्त्रीय गायन शैली बन गई।
इस परिवर्तन को सबसे पहले व्यवस्थित रूप से समझाने का श्रेय मतंग मुनि को जाता है। उन्होंने अपने ग्रंथ 'बृहद्देशी' में मार्गी और देशी संगीत के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया। यह ग्रंथ महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली बार 'राग' की अवधारणा को उस रूप में प्रस्तुत करता है जैसा हम आज समझते हैं।
जयदेव का 'गीत गोविंद'
प्रबंध गायन का सबसे प्रसिद्ध और सुंदर उदाहरण 12वीं सदी के कवि जयदेव की रचना '' में मिलता है। यह काव्य कृति राधा और कृष्ण के प्रेम की कहानी बताती है, और इसके सभी पद प्रबंध के रूप में रचे गए हैं।
प्रत्येक पद को एक विशिष्ट राग और ताल में गाने के लिए निर्देशित किया गया है। इसने कविता, भक्ति और संगीत को एक साथ पिरो दिया। 'गीत गोविंद' की लोकप्रियता ने प्रबंध गायन को पूरे भारत में फैला दिया और इसे शास्त्रीय संगीत के मंच पर स्थापित कर दिया।
प्रबंध एक संरचित रचना थी, लेकिन इसमें कवि की भावनाओं को व्यक्त करने की बहुत स्वतंत्रता थी। इसने संगीत को केवल तकनीकी अभ्यास से आगे बढ़कर भावनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
शारंगदेव का वर्गीकरण
13वीं शताब्दी में, संगीतज्ञ शारंगदेव ने अपने ग्रंथ 'संगीत रत्नाकर' में प्रबंध को व्यवस्थित रूप से परिभाषित और वर्गीकृत किया। उन्होंने प्रबंध के छह अंगों और विभिन्न प्रकारों का विस्तृत वर्णन किया। यह ग्रंथ आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए एक foundational text माना जाता है। शारंगदेव के अनुसार, एक प्रबंध के मुख्य अंग थे:
| अंग | विवरण |
|---|---|
| उद्ग्राह | रचना का प्रारंभिक, अनाबद्ध भाग (आलाप जैसा) |
| मेलापक | वह भाग जो उद्ग्राह और ध्रुव को जोड़ता है |
| ध्रुव | रचना का मुख्य, स्थायी भाग, जो बार-बार दोहराया जाता है |
| अंतरा | ध्रुव के बाद आने वाला एक नया संगीतमय खंड |
| आभोग | रचना का अंतिम भाग, जिसमें अक्सर संगीतकार का नाम होता है |
यह संरचित रूपरेखा ही वह नींव बनी जिस पर बाद में का विकास हुआ। ध्रुपद ने प्रबंध के 'ध्रुव' (स्थायी) और 'आभोग' जैसे तत्वों को विरासत में लिया और उन्हें अपनी अनूठी शैली में ढाला। इस प्रकार, प्रबंध ने उस पुल का काम किया जो प्राचीन गंधर्व संगीत को मध्यकालीन ध्रुपद से जोड़ता है।
अब आप जानते हैं कि ध्रुपद की जड़ें कितनी गहरी हैं। यह प्रबंध की समृद्ध विरासत पर बना है, जो स्वयं मार्गी संगीत से देशी संगीत में एक महत्वपूर्ण बदलाव का परिणाम था।
ध्रुपद का प्रत्यक्ष पूर्वज किसे माना जाता है?
किस ग्रंथ में पहली बार 'मार्गी' और 'देशी' संगीत के बीच के अंतर को व्यवस्थित रूप से परिभाषित किया गया था?
