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नोम-तोम आलाप विस्तार

विलंबित आलाप: स्वर का सूक्ष्म विस्तार

ध्रुपद गायकी में विलंबित आलाप केवल स्वरों का धीमा आरोह-अवरोह नहीं, बल्कि एक गहन ध्यान प्रक्रिया है। यहाँ गायक प्रत्येक स्वर के अस्तित्व को कण-कण महसूस करता है। इस प्रक्रिया के दो मुख्य तकनीकी पहलू हैं: 'लगाव' और 'छुटाव'। लगाव का अर्थ है एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाते समय पहले स्वर के अंश को साथ लेकर चलना, जिससे एक अटूट श्रुति-श्रृंखला बनती है। छुटाव वह कला है जहाँ गायक एक स्वर को धीरे-धीरे विलीन होने देता है, जिससे एक शून्य या 'अनहद नाद' की स्थिति उत्पन्न होती है।

स्वर का ठहराव ध्रुपद की आत्मा है। यह ठहराव बिना सही श्वास साधना के असंभव है। यहाँ रेचक-कुंभक-पूरक प्राणायाम की तकनीक काम आती है। 'पूरक' यानी धीमी और गहरी श्वास लेना, 'कुंभक' यानी श्वास को स्थिरता से रोकना (इसी अवस्था में स्वर का ठहराव होता है), और 'रेचक' यानी स्वर के साथ श्वास को नियंत्रित रूप से छोड़ना। यह केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि नाद और प्राण का एकात्म है, जो ध्रुपद को उसकी असीम गंभीरता और शांति प्रदान करता है।

अनहद नाद

noun

योग और संगीत दर्शन में, यह वह आंतरिक ध्वनि है जो बिना किसी आघात या टकराव के निरंतर सुनाई देती है। इसे 'अनाहत नाद' भी कहते हैं और यह ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक मानी जाती है।

मध्य लय: बोल और लय का संगम

जब आलाप 'जोड़' के चरण में प्रवेश करता है, तो लय का समावेश होता है, लेकिन ताल का बंधन नहीं होता। यहाँ नोम-तोम के अक्षरों का प्रयोग केवल लय दिखाने के लिए नहीं, बल्कि स्वर के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने के लिए किया जाता है। इसे 'बोल-आलाप' भी कहते हैं। उन्नत गायक 'तोम', 'नोम', 'री', 'दे', 'ता', 'नन' जैसे अक्षरों का प्रयोग करते हुए जटिल लयकारी पैटर्न बनाते हैं। यहाँ उद्देश्य केवल लयकारी दिखाना नहीं, बल्कि राग के भाव को अक्षरों के माध्यम से अधिक स्पष्ट करना है।

उदाहरण के लिए, एक ही स्वर पर विभिन्न अक्षरों का प्रयोग करके उसके अलग-अलग भाव दर्शाए जा सकते हैं। 'तोम' का प्रयोग गंभीरता और स्थिरता के लिए, जबकि 'री' या 'दे' का प्रयोग चपलता और करुणा के लिए किया जा सकता है। यह 'बोल-बाँट' का वह उन्नत स्तर है जहाँ गायक एक स्वर-चित्रकार की तरह अक्षरों के रंगों से राग की तस्वीर बनाता है।

द्रुत लय: झाला की ऊर्जा

आलाप का अंतिम चरण, जिसे 'झाला' कहते हैं, द्रुत लय में होता है। यह केवल गति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि ऊर्जा का चरमोत्कर्ष है। सितार या सरोद के झाला की तरह, यहाँ भी एक मुख्य स्वर और सहायक स्वर (अक्सर 'सा') के बीच तीव्र प्रत्यावर्तन होता है। नोम-तोम के अक्षर छोटे और अधिक धारदार हो जाते हैं, जैसे 'त-न', 'त-र'।

झाला में गमक का विशिष्ट प्रयोग होता है। एक विशेष प्रकार का गमक, जिसे हूंफत गमक कहते हैं, का प्रयोग ऊर्जा और ओज को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसमें डागर घराने के गायक श्वास को बलपूर्वक बाहर फेंकते हुए स्वर पर एक विशिष्ट आघात करते हैं, जिससे एक शक्तिशाली और नाटकीय प्रभाव उत्पन्न होता है। यह तकनीक अत्यधिक नियंत्रण और अभ्यास की मांग करती है और ध्रुपद आलाप को उसके शिखर तक ले जाती है।

झाला केवल गति नहीं, बल्कि नियंत्रित ऊर्जा का विस्फोट है जो श्रोता को एक अलग ही आध्यात्मिक स्तर पर ले जाता है।

इन तीनों चरणों, विलंबित, मध्य और द्रुत, में महारत हासिल करने के लिए वर्षों की साधना और गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। यह केवल संगीत नहीं, बल्कि स्वर और श्वास के माध्यम से स्वयं को जानने की एक आध्यात्मिक यात्रा है।

अब जब हमने नोम-तोम आलाप के सूक्ष्म पहलुओं को समझ लिया है, तो आइए अपने ज्ञान का परीक्षण करें।

Quiz Questions 1/5

ध्रुपद आलाप में 'लगाव' का क्या अर्थ है?

Quiz Questions 2/5

ध्रुपद में स्वर का ठहराव किस प्राणायाम तकनीक पर बहुत अधिक निर्भर करता है?

ध्रुपद का आलाप केवल एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक गहन आत्म-अन्वेषण है, जहाँ प्रत्येक स्वर और प्रत्येक श्वास साधक को अनंत की ओर ले जाता है।