कक्षा 10 भूगोल निर्मला प्रकाशन सचित्र गाइड
संसाधन एवं विकास
संसाधन: प्रकृति के उपहार और हमारी ज़िम्मेदारी
हमारे पर्यावरण में उपलब्ध हर वह चीज़ जो हमारी ज़रूरतों को पूरा कर सकती है, संसाधन कहलाती है। लेकिन यह इतना सीधा नहीं है। किसी वस्तु को संसाधन बनने के लिए तीन शर्तों को पूरा करना होता है: वह तकनीकी रूप से सुलभ हो, आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो, और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो। कोयला लाखों वर्षों से ज़मीन के नीचे था, लेकिन वह तभी संसाधन बना जब हमने उसे निकालने और इस्तेमाल करने की तकनीक विकसित की।
संसाधनों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है। चलिए इसे एक तालिका में देखते हैं।
| वर्गीकरण का आधार | प्रकार |
|---|---|
| उत्पत्ति (Origin) | जैव (पेड़-पौधे, जीव-जंतु) और अजैव (चट्टानें, धातुएँ) |
| समाप्यता (Exhaustibility) | नवीकरणीय (सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा) और अनवीकरणीय (कोयला, पेट्रोलियम) |
| स्वामित्व (Ownership) | व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय |
| विकास का स्तर (Status of Development) | संभावी, विकसित, भंडार और संचित कोष |
संसाधनों का विकास ज़रूरी है, लेकिन जब यह बिना सोचे-समझे किया जाता है, तो बड़ी समस्याएँ पैदा होती हैं। कुछ लोगों के लालच ने संसाधनों का अत्यधिक ह्रास किया है। इससे समाज अमीर और गरीब में बँट गया है और ओज़ोन परत में छेद, ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक पारिस्थितिकीय संकट पैदा हो गए हैं। यहीं पर की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।
सतत पोषणीय विकास
noun
पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए होने वाला विकास, जो वर्तमान की ज़रूरतों को पूरा करे और भविष्य की पीढ़ियों की ज़रूरतों की अवहेलना न करे।
भारत में संसाधन नियोजन
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में संसाधन नियोजन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ संसाधनों का वितरण बहुत असमान है। उदाहरण के लिए, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में खनिज और कोयले के प्रचुर भंडार हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश में जल संसाधन बहुतायत में हैं, पर वहाँ विकास की कमी है। राजस्थान में पवन और सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं, लेकिन जल संसाधनों की कमी है।
इसलिए, एक संतुलित राष्ट्रीय विकास के लिए संसाधन नियोजन आवश्यक है। यह केवल संसाधनों की उपलब्धता पर ही नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत ढाँचे पर भी निर्भर करता है।
भारत में संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें कई चरण शामिल हैं:
- पहचान और सूची बनाना: देश के विभिन्न हिस्सों में संसाधनों की पहचान करना, उनका सर्वेक्षण करना और मानचित्र बनाना।
- योजना का ढाँचा तैयार करना: उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत ढाँचे का उपयोग करके संसाधन विकास योजनाएँ लागू करना।
- समन्वय: संसाधन विकास योजनाओं और समग्र राष्ट्रीय विकास योजनाओं के बीच समन्वय स्थापित करना।
सिर्फ़ संसाधन होना ही काफ़ी नहीं है। इतिहास गवाह है कि कई ऐसे क्षेत्र जो संसाधनों में धनी थे, वे विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण बने क्योंकि स्थानीय लोगों के पास उन्हें विकसित करने की तकनीक नहीं थी। भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उनका नियोजन।
जीवन का आधार: मृदा संसाधन
मृदा या मिट्टी सबसे महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधनों में से एक है। यह पौधों को सहारा देती है और लाखों जीवों का घर है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह बनती कैसे है?
मृदा निर्माण एक बहुत धीमी प्रक्रिया है। कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में हज़ारों साल लग जाते हैं। यह प्रक्रिया कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि मूल चट्टान (जिससे मिट्टी के कण बनते हैं), जलवायु, वनस्पति, अन्य जीव और समय। तापमान में परिवर्तन, बहते पानी की क्रिया, पवन और हिमनदियाँ - ये सभी मृदा निर्माण में योगदान करते हैं।
भारत में विभिन्न प्रकार की मृदा पाई जाती है, जिसका मुख्य कारण यहाँ की विविध भू-आकृतियाँ, जलवायु और वनस्पतियाँ हैं।
अब, मृदा के ह्रास की समस्या पर आते हैं, जिसे कहा जाता है। यह एक गंभीर समस्या है। मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं। यह प्राकृतिक शक्तियों जैसे पवन, हिमनदी और जल द्वारा होता है, लेकिन मानवीय गतिविधियाँ जैसे वनोन्मूलन, अत्यधिक चराई, निर्माण और खनन इसे और तेज़ कर देते हैं।
तो हम इस बहुमूल्य संसाधन को कैसे बचा सकते हैं? मृदा संरक्षण के कई तरीके हैं:
- समोच्च जुताई (Contour Ploughing): ढलान वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती है।
- सोपान कृषि (Terrace Farming): तीव्र ढालों पर सीढ़ियाँ बनाकर खेती करने से अपरदन नियंत्रित होता है। यह पश्चिमी और मध्य हिमालय में काफी प्रचलित है।
- पट्टी कृषि (Strip Cropping): बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटा जाता है। फसलों के बीच में घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं। ये पवन द्वारा उत्पन्न बल को कमज़ोर करती हैं।
- रक्षक मेखला (Shelter Belts): पेड़ों को कतारों में लगाकर एक रक्षक मेखला बनाई जाती है, जो पवन की गति को कम करती है। यह विशेष रूप से शुष्क क्षेत्रों में बहुत प्रभावी है।
चलिए अब कुछ प्रश्नों के साथ अपनी समझ का परीक्षण करते हैं।
किसी वस्तु को 'संसाधन' के रूप में वर्गीकृत करने के लिए निम्नलिखित में से कौन सी शर्त आवश्यक है?
भारत में संसाधन नियोजन महत्वपूर्ण है क्योंकि संसाधनों का वितरण बहुत असमान है।
संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण न केवल वर्तमान के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी आवश्यक है। यह हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
