No history yet

प्रबंध की ऐतिहासिक उत्पत्ति

प्रबंध की जड़ें

ध्रुपद की गंभीर और संरचित दुनिया से आप पहले से ही परिचित हैं। लेकिन हर विशाल वृक्ष की तरह, ध्रुपद की भी गहरी जड़ें हैं जो संगीत के इतिहास में फैली हुई हैं। इन जड़ों में सबसे महत्वपूर्ण है 'प्रबंध गान', एक ऐसी विधा जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक व्यवस्थित रूप दिया।

इसकी कहानी सामगान से शुरू होती है, जो वैदिक काल का पवित्र संगीत था। यह संगीत मुख्य रूप से अनुष्ठानों के लिए था और इसके नियम सरल थे। समय के साथ, संगीत मंदिरों और राजदरबारों तक पहुँचा और एक अधिक व्यवस्थित रूप की आवश्यकता महसूस हुई। यहीं से 'जाति गान' का विकास हुआ, जहाँ रागों के पूर्वज 'जाति' पर आधारित गायन होता था। लेकिन यह अभी भी पूरी तरह से बंधा हुआ नहीं था।

प्रबंध इस विकास का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव था। यह एक ऐसी रचना थी जो ताल, पद (शब्द), और राग के नियमों में कसकर बंधी होती थी। इसने संगीत को एक अनौपचारिक कला से एक संरचित शास्त्रीय रूप में बदल दिया। प्रबंध ही वह नींव बना जिस पर आगे चलकर ध्रुपद जैसी विधाओं का निर्माण हुआ।

निबद्ध गान: संरचना का महत्व

भारतीय शास्त्रीय संगीत में दो मुख्य अवधारणाएँ हैं: अनिबद्ध और निबद्ध। अनिबद्ध गान का अर्थ है 'बिना बंधन का संगीत', जैसे कि राग का आलाप, जिसमें गायक बिना ताल के अपनी कल्पना का उपयोग करके राग का विस्तार करता है।

इसके विपरीत, निबद्ध गान का अर्थ है 'नियमों में बंधा हुआ संगीत'। प्रबंध इसी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह संगीतकार की रचनात्मकता को एक निश्चित संरचना के भीतर प्रस्तुत करने की कला थी। इसमें हर तत्व - शब्द, সুর, और ताल - पहले से तय होता था। इस अनुशासन ने ही संगीत को एक व्यवस्थित शास्त्र का दर्जा दिया।

प्रबंध

noun

प्राचीन और मध्यकालीन भारत की एक प्रमुख शास्त्रीय गायन शैली, जो छंद, ताल और राग के नियमों में बंधी एक संरचित रचना होती थी।

मतंग मुनि ने अपने ग्रंथ 'बृहद्देशी' में प्रबंध को 'छह अंगों' और 'चार धातुओं' से युक्त रचना के रूप में परिभाषित किया है। यह परिभाषा दिखाती है कि प्रबंध कितना व्यवस्थित था।

अंगअर्थधातुअर्थ
स्वरसंगीतमय स्वरउद्ग्राहरचना का प्रारंभिक भाग
बिरुदगायक के आश्रयदाता राजा की प्रशंसामेलापकदो भागों को जोड़ने वाला अंश
पदरचना के बोल या शब्दध्रुवस्थायी या टेक (जो बार-बार आए)
तेनकशुभ और मंगलकारी शब्दआभोगरचना का अंतिम भाग
पाटवाद्य यंत्रों (जैसे मृदंग) के बोल
ताललय का चक्र

यह संरचना सुनिश्चित करती थी कि रचना का एक स्पष्ट आरंभ, मध्य और अंत हो। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक कहानी में परिचय, विकास और निष्कर्ष होता है। 'ध्रुव' का बार-बार आना रचना को एक पहचान और स्थिरता देता था, जो आज भी हमें 'स्थायी' के रूप में दिखाई देता है।

मध्यकाल और भक्ति आंदोलन

मध्यकाल तक आते-आते, प्रबंध संगीत का मुख्य रूप बन चुका था। शारंगदेव के 'संगीत रत्नाकर' जैसे ग्रंथों में सैकड़ों प्रकार के प्रबंधों का उल्लेख मिलता है। यह दर्शाता है कि यह विधा कितनी विकसित और लोकप्रिय हो चुकी थी।

इसी समय, पूरे भारत में भक्ति आंदोलन की लहर चल रही थी। संत और भक्त कवि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए संगीत का उपयोग कर रहे थे। प्रबंध की संरचित प्रकृति, जिसमें शब्दों (पद) का बहुत महत्व था, भक्ति साहित्य को संगीतबद्ध करने के लिए एकदम उपयुक्त थी।

Lesson image

जयदेव का 'गीत गोविंद' इसका एक शानदार उदाहरण है। यह संस्कृत काव्य प्रबंध शैली में ही रचा गया था, जिसमें हर गीत एक विशिष्ट राग और ताल पर आधारित था। इसने संगीत को मंदिरों और पूजा-पाठ का एक अभिन्न अंग बना दिया। भक्त अपने इष्टदेव की स्तुति में प्रबंध गाते थे, जिससे संगीत और आध्यात्मिकता का एक गहरा रिश्ता बना।

समय के साथ, प्रबंध की जटिल संरचना धीरे-धीरे सरल होने लगी और इसने ध्रुपद जैसे नए रूपों को जन्म दिया। ध्रुपद ने प्रबंध के अनुशासन और गंभीरता को तो अपनाया, लेकिन उसकी कुछ जटिलताओं को त्याग दिया, जिससे यह गायकों के लिए अधिक सुलभ हो गया। इस तरह, प्रबंध भारतीय शास्त्रीय संगीत के विकास में एक महत्वपूर्ण सेतु बन गया, जिसने प्राचीन परंपराओं को भविष्य की विधाओं से जोड़ा।

आइए देखें कि आपने इस विषय में क्या सीखा।

Quiz Questions 1/5

ध्रुपद का प्रत्यक्ष पूर्ववर्ती कौन सी संगीत शैली थी, जिसने इसकी संरचनात्मक नींव प्रदान की?

Quiz Questions 2/5

'अनिबद्ध गान' और 'निबद्ध गान' में मुख्य अंतर क्या है?